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नई दिल्ली : एक ऐसा जनक्षेत्र जिसने ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अपनी बोलियों को पीछे रखकर एक सामूहिक विमर्श के निर्माण के लिए हिंदी को अपनी भाषा बनाया और इसी में एक सशक्त राजनीतिक विमर्श की रचना की, लेकिन सर्वांगीण विकास के विमर्श में पीछे रह गया और भूमंडलीकरण के दबाव से राजनीति का जैसे जैसे विस्तार हुआ मानवीय सूचकांक में पिछड़ता चला गया और एक ऐसी पट्टी में बदल गया जिसमें उपभोग करने की प्रवृत्ति अधिक है, उत्पादन की कम, और यह चाहे उपभोक्ता वस्तु का उपभोग हो या ज्ञान का। एक बात और ध्यान में आती है कि जाति, धर्म और लिंग की चेतना इस पट्टी पर इतनी हावी रही कि स्वतंत्र चेतना के निर्माण में बाधा आई और जिसके लिए की गई कोशिशें भी आबादी की तुलना में नाकाफी रहीं।

हिंदी पट्टी बाहर की दुनिया के लिए एक वैचारिक पूर्वग्रह भी निर्मित करती रही है और उसे सरलीकृत तरीके से देखा जाता रहा है, जबकि भीतर से इसमें हलचल मौजूद हैं। कई स्तर हैं जिसके समुचित अध्ययन के बिना इसकी आधी अधूरी समझ ही बनेगी।

ज्ञान की उपेक्षा और तिकड़म को आचरण की तरह स्वीकार कर लेना भी इस क्षेत्र की दिक्कत है। कथनी और करनी में फर्क करते हुए जीने की कला में इस क्षेत्र के लोग दक्ष हैं।

प्रगतिशील कहलाए जाने वाले बौद्धिक भी अपने निजी अभ्यास में वर्चस्व को बरकरार रखना चाहते हैं और इसी आधार पर गोलबंदी करते हैं। इससे निजात पाने का जो मुख्य तरीका समझ में आता है वह है रैडिकल सोच वाले बौद्धिकों का उभार, जो लिंग और जाति की शब्दावली से बाहर निकल कर समाज को आगे ले जाने की सोचें। इसमें दिक्कतें होंगी, लेकिन सामूहिक प्रक्रिया के द्वारा नवीन शिक्षितों में, खासकर अधीनस्थ जाति और लिंग में वर्चस्व से बाहर निकलने की आकांक्षा का प्रसार कर ऐसा किया जा सकता है।

हिंदी भाषा में ज्ञान उत्पादन कर और इसके समावेशी स्वरूप बनाए रख कर भी हिंदी पट्टी की दिक्कतों से निजात पाया जा सकता है, लेकिन जरूरी है कि प्रगतिशील सोच को बढ़ाने वाली सामग्री का निर्माण हिंदी भाषा में हो जिससे अधिक से अधिक लोग इसके दायरे में आ सकें। अंग्रेजी के भरोसे बहुत कुछ नहीं छोड़ा जा सकता।

हिंदी भाषा में लैंगिक चेतना तो हावी है, लेकिन एक सामंतवादी, पिछड़े, भेदभावपूर्ण समाज के निर्माण के मूल में भाषा नहीं है। समस्या कहीं और है। वह जीवन शैली में है जो किसी दूसरी भाषा में भी अभ्यास के जरिए शामिल हो जाएगी और हो जाती है, वरना हिंदी पट्टी में अंग्रेजी के बढ़ते जाने से ही ये समस्याएं दूर हो जानी चाहिए थीं। दरअसल दिक्कत वहां भी है जहां हमने अपनी जीवनशैली की बुनियाद को आधुनिकता की हर चेतना से मुक्त रखने की कोशिश की है और बाहरी जीवन में आधुनिकता को स्वीकार किया है। आंतरिक वृत्त के ऊपर आत्मविश्वास इतना गहरा है कि इसमें हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होता इसलिए इसको तोड़ सकना भी आसान नहीं है। और हमारा अधिकांश जीवन व्यवहार, जिससे हमारा मानस निर्मित होता है, उस पर इस आंतरिक वृत्त का जबरदस्त प्रभाव होता है। बहुत से लोग इसको पहचान भी नहीं पाते। इसलिए उनको अपने आचरण की द्वैधता में कोई समस्या ही नहीं दिखती और वे इसे सहज मानते हैं। आधुनिक संस्थानों में काम करते हुए भी हमारा निजी आचरण आधुनिकता से मुक्त रहता है जिस पर तर्क की जगह भावनाएं और स्वार्थ हावी रहती हैं। लोकतांत्रिक संस्थानों को अपनाते हुए उसमें काम करते हुए भी हम लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर रहते हैं। हमने बाहर और भीतर के आचरण में एक स्पष्ट दूरी बना ली है और इसको पाटे बिना एक विकसित सार्वभौमिक समाज बनाना मुश्किल है।

भविष्य इन्हीं का है। विश्वविद्यालय के अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि परिसरों में अब बड़ी संख्या इन वर्गों के छात्रों की आ रही है और अधिकांश इस चेतना से लैस होते हैं कि शिक्षा उनके जीवन में बदलाव ला सकती है इसलिए वे तैयारी भी करते हैं। उनको चाहिए बेहतरीन शैक्षिक परिसर।

अपवाद हो सकते हैं। निजी शैक्षिक संस्थानों का उभार भी एक समस्या है जो अंतत: शिक्षा को उपभोक्ता सामग्री बना देगा और इस वर्ग के पास अभी शिक्षा खरीद सकने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। निजी शिक्षण वैसे भी अंग्रेजी आश्रित है और यह वर्ग अधिकांशत: हिंदी के भरोसे है। तो हिंदी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

हिंदी पट्टी में ही हिंदी अब कमजोर और आर्थिक रूप से कम संपन्न लोगों की भाषा बन गई है, और ये सभी वर्ग ऐसे ही हैं। ये सब मिल कर हिंदी के एक विशाल पाठक वर्ग का निर्माण करते हैं और इन तक पहुंचने के लिए हिंदी की सभी अभिव्यक्तियों को इन्हें स्पेस देना होगा। और इस वर्ग की प्रामाणिक अभिव्यक्तियों के लिए हमें इस वर्ग द्वारा रचे गए आख्यानों की जरूरत पड़ेगी। इसलिए यह वर्ग अपनी पीड़ा, अपना उल्लास, अपने भविष्य का नक्शा इस भाषा में रचेंगे, जिसे सार्वजनिक विमर्श में जगह देना ही होगा।

राजनीतिक और मुक्तिकामी चेतना का प्रसार जैसे जैसे इस वर्ग में होता जाएगा सार्वजनिक विमर्श में इनका दबाव दिखने लगेगा। ऐसा नहीं है कि सार्वजनिक विमर्श आसानी से इनके लिए रास्ता बना देगा, बल्कि वह तो अपने को छली तरीके से इनके पक्ष में दिखाते हुए इनके आख्यानों पर भी अपना कब्जा करना चाहेगी, लेकिन निहित छल को आखिरकार यही वर्ग अनावृत करेगा। धीरे-धीरे संस्थानों पर यह अपने वास्तविक हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाएगा, जो दिखने भी लगा है। वर्षों के एकाधिकार को तोड़ना आसान नहीं होगा, प्रगतिशील समुदाय भी इतनी आसानी से जगह नहीं देगा, इसलिए संघर्ष होगा, लेकिन अंतत: एक बेहतर भविष्य का दरवाजा खुलेगा, जिससे समाज में भी बेहतरी आएगी। विविध रंग आपस में मिल कर ही बेहतर सौंदर्य का निर्माण करते हैं, यह हमें ध्यान रखना चाहिए।

टिपण्णी: (उपरोक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं। लेखक संदीप स्तंभकार एवं मीडिया के जानकार हैं एवं भारतीय संसद मे भी अपनी सेवाएं देते हैं।)

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