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Fatehpur : लोगों को सस्ती जेनेरिक दवाएं मुहैया कराने के लिए जिला अस्पताल में खोले गए दो जन औषधि केंद्र बंद हो गए हैं. सितंबर 2018 में खुले इन केंद्रों में दो साल में सितंबर 2020 में ताला लग गया. नवीनीकरण न होने से ड्रग लाइसेंस भी निरस्त हो चुका है.

जिला पुरुष और जिला महिला अस्पताल में सितंबर 2018 में जन औषधि केंद्र खोले गए थे. इनका दो साल में नवीनीकरण होने का प्रावधान है. सितंबर 2020 में कोरोना काल के दौरान टेंडर लेने वाली संस्था और वेंडर के बीच मतभेद हो गया. इसके बाद से केंद्र बंद हो गए. स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी इस विवाद को सुलझाने में रुचि नहीं दिखाई गई. इस कारण टेंडर का नवीनीकरण भी नहीं हुआ.

जब दोनों संस्थाओं में समझौता हुआ, तब तक ड्रग लाइसेंस निरस्त हो गया. इसके बाद से अब तक दोनों केंद्रों पर ताला लटक रहा है. अभी तक ड्रग लाइसेंस लखनऊ कमिश्नर कार्यालय से जारी नहीं हुए हैं. लोगों ने मेडिकल स्टोरों से डॉक्टरों को मिलने वाले कमीशन के खेल में केंद्रों को बंद कराने का आरोप लगाया है.

330 रुपये का इंजेक्शन केंद्र में 100 रुपये का

मेडिकल स्टोरों में मिलने वाली दवाएं पेटेंट होती हैं. जेनेरिक दवाओं का पेटेंट नहीं होता है. ये दवाएं पेटेंट वाली दवाओं से कई गुना सस्ती होती हैं. उदाहरण के तौर पर ताकत के लिए लगने वाला डेका डेरोबोलिन इंजेक्शन मेडिकल स्टोर संचालक को थोक में 290 रुपये में मिलता है. जिसका प्रिंट रेट 330 रुपये होता है. यही इंजेक्शन जन औषधि केंद्र में 100 रुपये का मिलता है. इसी तरह दर्द की दवा ब्रूफेन 600 MG मेडिकल स्टोर में पांच रुपये की एक मिलती है. जन औषधि केंद्र में इसकी कीमत मात्र दो रुपये है.

मेडिकल स्टोर संचालकों की चांदी

जिला अस्पताल में जन औषधि केंद्र खुलने से मरीजों को बड़ी राहत मिली थी. सस्ती दवाएं मिलने के कारण इनकी जेब पर बोझ नहीं पड़ रहा था. इन केंद्रों के खुलने के बाद जिला अस्पताल के बाहर स्थित मेडिकल स्टोरों में खरीदारों की भीड़ भी कम हुई थी. 15 माह से दोनों जन औषधि केंद्र बंद हो जाने से मेडिकल स्टोरों की फिर से चांदी हो गई. फिर से इनके काउंटर पर दवा लेने वालों की भीड़ दिखने लगी है.

शहर के लाला बाजार निवासी मोहम्मद नूर (Mo. Noor) का कहना है कि रोगियों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने की सरकार की योजना कारगर नहीं साबित हो रही है. कुछ दिन चलने के बाद जन औषधि केंद्र बंद हो गए हैं. ऐसे में रोगियों को मजबूरन कई गुना महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं.

शहर निवासी शहनवाज अनवर (Shahnawaz anvar) का कहना है कि एक साल से अधिक समय से बंद जन औषधि केंद्र को लेकर स्वास्थ्य विभाग मूक दर्शक बना है. रोगी केंद्रों में ताला बंद देखकर लौट जाते हैं. इसके बाद अस्पताल के बाहर मेडिकल स्टोरों से महंगी दवा खरीदते हैं.

पटेलनगर निवासी श्रवण कुमार गुप्ता (Shrawan kumar gupta) का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग ने जानबूझकर प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों को बंद करा दिया है. इसकी वजह डॉक्टरों को मेडिकल स्टोर संचालकों से मिलने वाला कमीशन है. यही कारण है कि इनके संचालन का प्रयास भी नहीं हो रहा है.

पटेलनगर निवासी दिनेश पटेल (Dinesh patel) ने कहा कि अस्पताल के दोनों जन औषधि केंद्र बंद होने का खामियाजा रोगियों का उठाना पड़ रहा है. जरूरत पड़ने पर बाहरी दवाएं कम कीमत पर मिल जाती थीं, लेकिन केंद्र बंद होने से रोगियों को कई गुना अधिक कीमत देनी पड़ रही है.

प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों का टेंडर शासन स्तर से होता है. कमिश्नर ड्रग लाइसेंस का नवीनीकरण करते हैं. ऐसे में इन केंद्रों के विषय में उन्हें अधिक जानकारी नहीं है, फिर भी अस्पताल के दोनों केंद्र संचालित करने के लिए लिखा-पढ़ी की जाएगी.
डॉ. राजेंद्र सिंह(Dr. Rajendra singh) (CMO)

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