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आज हर तरफ विश्व के बदले परिवेश और ‘न्यू नॉर्मल’की चर्चा है। क्या भारत के युवा तैयार हैं इस ‘न्यू नॉर्मल’ के लिए;बता रहीं हैं  विष्णुप्रिया पांडेय जो पिछले बारह वर्षों से दिल्ली के विभिन्न जन संचार संस्थानों में प्राध्यापिका रहीं हैं और वर्तमान में भारतीय जन संचार संस्थान, नई  दिल्ली के भारतीय सूचना सेवा विभाग में पाठ्यक्रम संयोजक के पद पर कार्यरत हैं और साथ हीं मीडिया र छात्र-संपर्क अधिकारी का भी अतिरिक्त प्रभार संभाल रही हैं।

कोविड-19 की इस अभूतपूर्व महामारी ने पूरे विश्व को बदल दिया है। अमूमन तो बदलाव शाश्वत सत्य है और अंग्रेज़ी में यह कहावत प्रचलित है – “चेंज इज़ द ऑनली कॉन्स्टेंट”, पर पिछले चार महीनों में हमारी दुनिया जिस तेजी से बदली है उसने ख़ासकर युवाओं की ज़िदगी को अनिश्चितता, बेचैनी और बोरियत से भर दिया है।यह भी सच है कि मानव इस पृथ्वी का सबसे जुझारू प्राणी है और उसके जीवन की सबसे ऊर्जावान और संभावनाओं से भरी अवस्था है-युवा अवस्था,तो आइए जाने हमारे देश और समाज को इन युवाओं से किस प्रकार के बदलाव की दरक़ार है।

दिनचर्या सम्बन्धी बदलाव– आज जब सभी स्कूल कॉलेज बंद हैं तो विद्यार्थियों के लिए अपनी सामान्य दिनचर्या का पालन भी मुश्किल हो गया है। दिनचर्या में यह अनियमितता युवाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। यकीनन कोरोना-काल के बाद धीरे-धीरे सबकुछ  सामान्य हो जाएगा पर आपके जीवन का यह वर्ष दुबारा नहीं आने वाला तो अपने दिनचर्या की कमान अपने हाथों में ले लीजिए। अपने सोने और जागने का समय निश्चित कीजिए। अपनी पूरी दिनचर्या को अपनी सहुलियत के हिसाब से विभिन्न हिस्सों में बाँटिए ताकि आप अपने अध्ययन, शौक और व्यायाम जैसी जरूरी गतिविधियों को पर्याप्त समय दे सकें। हर रात सोने से पहले अपनी पूरी दिनचर्या पर नज़र डालना न भूलें। क्या आपने अपने द्वारा पूर्वनिश्चित गतिविधियों कोपर्याप्त समय दिया? यह आपकी ज़िंदगी है। इसकी सफलता के लिए आप उत्तरदायी हैं, तो अपना मूल्यांकन स्वयं करें।

स्क्रीन टाइम और दोस्तों से संपर्क सम्बन्धी बदलाव – अधिकतर युवा अपने मित्रों से प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिल पा रहे हैं। स्कूल-कॉलेज भी बंद हैं और अन्य बाहरी गतिविधियाँ भी; ऐसे में स्क्रीन टाईम बहुत हीं बढ़ गया है जिसका हानिकारक प्रभाव आँखों के साथ-साथ मस्तिष्क पर भी हो रहा है। आप कहेंगे, दूसरा विकल्प हीं क्या है! पर यकीन मानिए आपके पास विकल्प है, और वह भी एक खूबसूरत विकल्प! इसके पहले कभी आपको शायद यह मौक़ा न मिला हो कि आप किचेन में अपनी माँ का हाँथ बँटा पाएँ या फिर उनसे उनके शौकपर कुछ चर्चा कर पाएँ।

स्क्रीन की आभासी दुनिया से निकल कर आप अपने परिवार के साथ कुछ वक्त गुज़ारें। अपने माता-पिता को थोड़ा और समझने की कोशिश करें; हो सके तो उनसे उनके कॉलेज के दिनों के किस्से सुनें। छोटे भाई- बहन अगर घर में हैं तो उनसे अपने अनुभव साझा करें, मसलन आप उनके उम्र में क्या सोचते थे; आपको किस तरह की समस्याएँ थी और किस तरह आपने उनका सामना किया। यकीनन यह सब स्क्रीन की उस आभासी दुनिया से बहुत ही ज़्यादा रोचक होगा!

अपने व्यक्तित्व सम्बन्धी बदलाव – यह समय है स्वयं को फिर से परिभाषित करने का। थोड़ा गुणवत्ता-पूर्ण समय स्वयं को दीजिए। अपने सपनों को पूरा करने के रास्ते में आने वाली  बाधाओं पर एक नज़र डालिए। उनसे निपटने की कार्ययोजना बनाइए और उस पर तत्काल अमल शुरू कर दीजिए। यह वक्तअपनेशौकको ज़िंदा करने का भी है, क्योंकि आपके शौक कहीं न कहीं आपके सपनो की उड़ान को और उंचाई देते हैं। अपने मानसिक विकास के साथ-साथ अपने शारीरिक स्वास्थ्य को भी अहमियत दें। आपका शरीर आपके मस्तिष्क का हीं विस्तार है और आपका मस्तिष्क आपके शरीर का एक अंग। कुल मिलाकर यह कोरोना काल इस युग की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने है, अब देखना यह है कि हम इस समस्या को किस हद तक संभावनाओं में बदल पाते हैं!

शुभचिंतकविष्णुप्रिया पांडेय

(लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखिका के निजी विचार हैं)  

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