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Fatehpur : जहां एक ओर सरकार जनजागरण के तहत जन मानसको वन और वन्य जंतु संरक्षण के लिए जैवविविधता के महत्व सहित पर्यावरण, भूमिगत जल संरक्षण, ग्लोबल वार्मिंग नियंत्रण और उन्नत कृषि के लिए वन संपदा संरक्षण के साथ अधिक से अधिक पौधा रोपण पर जोर दिया जा रहा है वही, बन विभाग की निष्क्रियता के चलते खुले आम हरे भरे बनो को उजाड़ कर धन बटोरने में लगे है.

जिसकी बानगी कल्यानपुर थाना क्षेत्र से ली जा सकती है. जहाँ लकड़ी तस्करों की एक बड़ी फौज है. जो बेखौफ हरे भरे फलदार पेड़ आम नीम आदि को सफाया कर काले बाजार में बेंच रही है. अगर लोगों की मानें तो इनका संरक्षण बन विभाग में तैनात एक दरोगा दे रहा है. जो बिंदकी में तैनात है जो स्थानीय पुलिस से साठगांठ कर इन तस्करों को अभयदान दे रहा है.

लिहाजा वृक्षों के अंधाधुंध कटान से मानव जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. आग उगलती जमीन और सिर पर सूर्यदेव की तपिश से बचने के लिए पेड़ों की छाया ढूढने पर दूर तक नसीब नहीं होगी। हरे-भरे वृक्ष माफियाओं की जकड़न में हैं. पेड़ मरते जा रहे हैं और जिला प्रशासन इस विनाश को होते देख रहा है. वह दिन दूर नहीं जब जिले में दूर तक पेड़ नहीं दिखेंगे. होंगी तो बस कंक्रीट कंस्ट्रक्शन और तपती चौड़ी सड़कें और खुला आसमान.

विभाग की मिलीभगत से तमाम जंगल उड़ता जा रहा है. हजारों बीघा जंगल पर माफियाओं ने कब्जा जमा लिया है. जिले भर में सालो साल सैकड़ों बीघा हरे-भरे आम के बाग, सड़क किनारे लगे पेड़-पौधे और वन विभाग के जंगल को उजाड़ दिया जा रहा है. जबकि, हर साल लगाए जाने वाले पौधे देख-रेख के अभाव में सूख जाते हैं.

शहर कस्बों के इर्द-गिर्द हरे-भरे पेड़ों को काटकर प्लाटिंग कर दी गई है. जिस कारण फिजा और पर्यावरण में जहर घुलता जा रहा है. ऐसे में जहां प्राणवायु यानी ऑक्सीजन की कमी होने लगी है, वहीं मौसम का चक्र भी पूरी तरह बिगड़ गया है. वायुमंडल में कार्बनडाइ ऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है. सांस लेना भी दुभर होता जा रहा है.

बिगड़ते वायुमंडल के चलते सांस, संक्रमण जैसी गंभीर बीमारियां पैदा हो रही हैं. ऐसे में हम सभी को वृक्षों को सहेजने की तरफ बढ़ना होगा. इससे प्राणवायु का स्तर सुधारेगा और पर्यावरण भी बचाया जा सकेगा. पेड़ों की लगातार कटाई होने की वजह से दिन प्रतिदिन वन क्षेत्र घटता जा रहा है. यह पर्यावरण की दृष्टि से बेहद चिंता का विषय है.

विभिगीय अधिकरियों की मिलीभगत से पेड़ों को काटाकर वृक्षों के संरक्षण के लिए बने नियम और कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. इससे प्राकृतिक संरचना बिगड़ रही है. जो स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक साबित हो रहा है.

लेख – टीम वाच इंडिया नाउ

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