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आगामी 2 नवंबर को अमेरिका (US) में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव (President Elections) में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी (Democratic Party) एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप साबित करने में लगे हुए हैं. डेमोक्रेटिक पार्टी जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के कोरोना महामारी को हल्के में लेने और देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने के लिए जिम्मेदार ठहरा रही है तो नहीं अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी (American Republican Party) डोनाल्ड ट्रंप के लिए हुए फैसलों और निर्णय को देश हित में लिए गए निर्णय बता कर वोट बटोरने की कोशिश कर रही है. जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है वैसे वैसे 2020 का अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव और भी ज्यादा दिलचस्प होता जा रहा है.
इन चुनाव को और भी ज्यादा दिलचस्प बनाते हुए डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडन ने 55 वर्षीय कमला हैरिस (Kamala Harris) को उप-राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया है.  हैरिस पहले ही अपने बुलंदियों के झंडे गाड़ चुकी है और जो बाइडेन के साथ वे भी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने की रेस में थी. हैरिस 1 साल पहले ही  उम्मीदवारों की भीड़ से अलग छाप छोड़ी थी और उन्होंने लगातार कई बेहतरीन भाषण भी दिए. यही नहीं, राष्ट्रपति पद की रेस में उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी जो बिडेन की आलोचना भी ख़ूब की थी.

कौन है कमला हैरिस
कैलिफ़ोर्निया (California) की डेमोक्रेटिक सीनेटर (सांसद) कमला हैरिस ऑकलैंड में पैदा हुईं थीं. उनकी मां भारतीय मूल की हैं और पिता जमैका मूल के और दोनों के  तलाक के बाद हैरिस को उनकी हिंदू मां ने अकेले ही पाला. कैंसर रिसर्चर और सिविल राइट्स एक्टिविस्ट रही उनकी मां, भारतीय विरासत के साथ पली बढ़ीं थीं. हैरिस के अनुसार वे अपनी मां के साथ भारत आती रहीं लेकिन उनकी मां ने अमरीकी-अफ्रीकी संस्कृति अपना ली थी और अपनी दोनों बेटियों कमला और माया को भी इसी में रखा. अपनी मां के बारे में बात करते हुए हैं हैरिस कहती हैं, “मेरी मां बहुत अच्छे से जानती थी कि वो दो काली बेटियों को पाल रही है.”
होवार्ड विश्वविद्यालय सिर्फ लड़ाई करने वाली कमला हैरिस क़ानून की पढ़ाई के लिए कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी, हैस्टिंग चली गईं. इसके बाद उन्होंने अलामेडा काउंटी डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी ऑफिस से अपने लॉ करियर की शुरुआत की. वर्ष 2003 में उन्हें सैन फ्रांसिस्को का शीर्ष अधिवक्ता बनाया गया. इसके बाद हैरिस अमरीका के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य कैलिफ़ोर्निया की अटॉर्नी जनरल चुन ली गईं. गौरतलब है कि इस पद पर पहुंचने वाली वो पहली महिला और पहली अफ्रीकी महिला भी बनीं. अटॉर्नी जनरल बनने के अपने कार्यकाल के दौरान ही नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर उभरते सितारे और मजबूत व्यक्तित्व वाली महिला की छवि बनाई. अपनी साख के सहारे उन्होंने साल 2017 में कैलिफोर्निया की जूनियर यूएसए नेटवर्क के चुनाव लड़ा और उसमें जीत भी हासिल की. इतना ही नहीं अमेरिकी सीनेट में पहुंचकर वे अपनी बातों और भाषणों की वजह से चर्चा में रही थीं.

क्यों कमला हैरिस नहीं बन सकीं डेमोक्रेटिक पार्टी की राष्ट्रपति उम्मीदवार?
साल 2019 में जब कमला हैरिस ने 20 हज़ार लोगों की भीड़ के सामने ऑकलैंड कैलिफ़ोर्निया में राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का ऐलान किया तो वो साल 2020 के इस दांव के लिए काफ़ी उत्साहित थीं. माना कि 2019 के अंत तक उनका चुनाव प्रचार ठंडा पड़ने लगा क्योंकि वह अपने कैंपेन को लेकर स्पष्ट तर्क देने में असफल रहीं. अमेरिकी रिपोर्टरों ने जब उनसे स्वास्थ्य सेवा जैसे मुद्दे पर सवाल किए तो उन्होंने काफ़ी गोलमोल जवाब दिए थे. डेमोक्रेटिक पार्टी की राष्ट्रपति उम्मीदवार ना बन पाने का मुख्य कारण था कि वो अपनी उम्मीदवारी के दावे को लेकर ज्‍यादा नंबर नहीं जुटा पाईं. बेशक उनके अंदर की अधिवक्ता वाली खूबियां निखर कर अाई लेकिन प्रगतिशील और उदारवादी धाराओं के बीच संभलकर चलने की उन्होंने कोशिश की लेकिन दोनों में से एक को भी सही से अपील नहीं कर पाईं. अंततः 2020 की शुरुआत में डेमोक्रेटिक का पहला उम्मीदवारी कॉन्टेस्ट होने से पहले ही दिसंबर 2019 में उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली.

अपराध और पुलिसिंग को लेकर उनका रिकॉर्ड.
भारत से संबंध रखने वाली कमला हैरिस की उम्मीदवारी ने उनके कैलिफ़ोर्निया के टॉप अधिवक्ता के रिकॉर्ड को चर्चा के केंद्र में लगा दिया है. हालांकि गे मैरिज और मृत्युदंड जैसे मसलों पर वामपंथी झुकाव होने के बावजूद वो बार-बार प्रगतिशील सोच वाले लोगों के निशाने पर रही हैं. उनके अभियान की शुरुआत में बाज़ेलन ने लिखा था कि हैरिस ने पुलिस सुधार, ड्रग सुधार और ग़लत तरीक़े से अपराधी ठहराए जाने जैसे मसलों की प्रगतिशील लड़ाइयों से किनारा किया.
अमेरिकी चुनाव प्रचार अभियानों के दौरान “कमला इस अ कॉप” वाक्य का खूब इस्तेमाल हो रहा है, जिससे प्राइमरीज़ में ज़्यादा लिबरल डेमोक्रिटिक बेस हासिल करने में उन्हें मुश्किल हो रही है.
इस वक्त अमरीका में नस्लवादी घटनाओं और पुलिस की बर्बरता पर बहस छिड़ी हुई है, ऐसे में हैरिस को अपने अनुभव का फायदा मिल सकता है. हैरिस ने कहा है कि पूरे अमरीका में पुलिस के काम के तरीक़े में सुधार होना चाहिए. उन्होंने उस पुलिस अधिकारी की गिरफ्तारी की मांग की जिनके हाथों 26 साल की अफ्रीकी-अमरीकी महिला ब्रेओना टेलर की जान चली गई थी.

कमला हैरिस क्यों बनी उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार?
पहले तो यह बता दें कि कमला हैरिस ने सुसान राइस, कैरेन बास और अन्य को पछाड़कर यह उम्मीदवारी हासिल की है.

अपने एक ईमेल में जो बाइडेन ने कहा, “मुझे किसी ऐसे शख़्स का साथ चाहिए जो स्मार्ट हो, कड़ी मेहनत करे और नेतृत्व के लिए तैयार रहे. कमला वो शख़्सियत हैं.” यह सारी खूबियां फ्रिज के अंदर मौजूद है. उसके अलावा उन्हें कैलिफोर्निया जैसे बड़े राज्य के नेतृत्व का भी अनुभव है और उनके भाषण देने की के तरीके और चर्चा करने के तरीके से लोग पहले ही बहुत प्रसन्न है. हैरिस का नाम आगे आने से प्रगतिशील मतदाताओं पर असर पड़ सकता है जो प्रवासन और नस्लीय न्याय के बारे में सोचते हैं. बाइडन ने लिखा, “सीनेट की दो महत्वपूर्ण समितियों-ख़ुफिया और न्याय में सबसे सशक्त और सबसे असरदार सांसद रही हैं.”

“क्रिमिनल जस्टिस और शादी में बराबरी जैसे मुद्दों पर वो प्रभावी नेता हैं. कोरोना वायरस की वजह से देश में फैली नस्लीय विषमता पर भी उनका ध्यान है.”, बाइडन ने लिखा. दूसरी वजह, बाइडेन को अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय के वोटों से मिली जीत है जिसके बाद पार्टी के भीतरिया मांग उठी की उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार इस समुदाय का ही हो. तीसरी वजह, अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस के हाथों मौत है. जॉर्ज की मौत के बाद पूरे अमेरिका में ब्लैक मेटर लीव्स नाम से अमेरिकी-अफ्रीकी समुदाय के समर्थन में आंदोलन चल पड़ा और डेमोक्रेटिक पार्टी पर भी इसका दबाव बढ़ा. प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि इस विषय में कुछ ठोस कदम उठाया जाए जिसको देखते हुए ही बाइडन को हैरिस को चुनना पड़ा.
चौथी वजह, जो बाइडेन के बेटे जो कमला हैरिस को अटॉर्नी जनरल के समय से जानते हैं और उनका काफी सम्मान भी करते हैं. खुद बाइडेन ने माना कि उन्होंने अपने बेटे के विचारों पर काफी गंभीरता से चिंतन करने के बाद यह फैसला लिया. पांचवा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है अफ्रीकी मूल के अमरीकियों के करीब 13 फ़ीसदी वोट हैं और कई राज्यों में उनके वोट काफ़ी अहम हैं.

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